लिखता रहूं तुझे मै जीवन भर
मैं लेखक तो लेखनी तुम बन जाओ
अंतर बस इतना- मैं कलम तो तुम स्याही
लिखूं चाहे जो भी मैं, मेरे शब्दों के अर्थ बन जाओ
मेरा तुम्हारा कारवाँ बस ऐसे ही चलता रहे
शब्दों को जन्म देने के लिए सदियों से कलम चली हो जैसे
सुख-दुःख लाभ-हानि,
जय-पराजय सबमें समानता तुमने बताया हैं
तेरे प्रेम ने ही वैरागी हमे बनाया हैं,
लेखक पीछे छूट गया उसकी जगह
खुद में अब प्रेमी को पाया हैं
मिल जाये जो साथ तुम्हारा
लिखेंगे हम भी अपनी प्रेम गाथा
शब्दों को जोड़-जोड़ अपनी कहानी बनायेंगे,
शब्दों को कुछ इस तरह सजांयेंगे की,
प्रेम ग्रन्थ में सबसे पहले अपनी प्रेम कहानी को पाएंगे।
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©vikasgarg
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