एक तूफान आने को है
एक सैलाब जाने को है
एक आग दहक रही है
एक आंधी गुजरने को है
धूप छांव का वजूद तो
जाने कहां मिट सा गया
तिनके उड़ रहे, कांच टूट रहे
पतझड़ आ रहा, बसंत सामने है
भाव मन के निकल रहे
सांसों में एक खुशबू समा रही
सामने खड़ी परीक्षा है
जो मेरी पहरेदारी पे है।
©anusingh
A