आसमान में उड़ता परिंदा हमसे कहता है....
तू हर रोज अचानक क्यों ठहरता है....
चलता चलता अचानक भाव में क्यों बहता है....
हंसता हुआ तु चलता है फिर गमों की लहरों में क्यों बहता है....
अपने भीतर के पंखों को पहचान फिर देख तू कहां से कहां पहुंचता है....
सबके आस पास एक फरिश्ता है जो तुम्हारी सरलता से ही निखरता है....
उसकी बातों से हमारा ठहरा कदम फिर से आगे चल पड़ता है....
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