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परख

मुझे परख नहीं है हीरे की फिर भी
गुफ्त गूंँ करना चाहता हूँ ।
बातो बातो मे ही सब समझना चाहता हूँ,
मुझे हर सूरत में अब तेरी शीरत नजर आती हैं ,
तेरे संग रहना चाहता हूँ ।
ना जाने क्यूँ धडकता हैं ये दिल ,
अब यही कहना चाहता हूँ ।
मुझे परख नहीं है हीरे की फिर भी ,
गुफ्त गूंँ करना चाहता हूँ ।
©sandeepgup