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" प्रकृति "

जब भी मैं प्रकृति से दूर होता हूं....
तो उसकी यादों को संजोता हूं.....
और बीते वक्त के पहियों पर सवार होकर
उसी दुनिया में खोता हूं.......
जहां में प्रकृति की गोद में सिर रखकर सोता हूं....
हवाओं के संग बादलों में यूँ मदहोश होता हूं कि
शांति में ही अपना सर्वस्व डुबोता हूँ.....
हरे पत्तों की छांव में भीतर से समभाव होता हूं....
पंछियों के संग मैं भी थोड़ा मस्तीखोर होता हूं.....
प्रकृति की सुंदरता में ऐसे मोहित होता हूं कि भीतर के खलिहान में ईश्वर के बीज बोता हूं......
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