मन की कैसी है डगर..
प्रकृति का है जिसमे शहर..
जिसमें लिपटा है मेरा हर पहर..
लगता है रब की है महर..
क्योंकि प्रकृति है हमसफर..
बंधन का कैसा है कहर..
कदम जाता है ठहर ..
वक्त की होती नहीं खबर..
जब भी मिलते हैं उससे इस कदर..
शांति की बहती है लहर..
अद्भुत संयोग का होता है वो पहर ..
जिसमें डूब जाता है मेरी उलझी पतंगों का शहर..
रहता हूँ इस दुनिया से बेखबर ..
जब रखता हूँ उसकी गोद में अपना सर......
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