चिडियों का वो शोर न जाने कहाँ खो गया,
गाड़ियों के शोर मे सब खामोश हो गया।
बस पिजंरो मे कैद मुर्गे सारी रात चिललाते है,
हर दिन एक सदी की तरह बिताते है।
न धर्ती बची है और न आसमान,जहाँ देखो इमारतें ही ईमारतें है।जीव जनतूओं की कराह, अपनी मुक्ती को पुकारते है।
घरों मे पडी मेज कुर्सीयां यह बताती है कि, हमने अपने घर सजाने के लिये कितने पछींयो के घर उजाड दिये।
थालीयों मे पडी हड्डियां बताती हैं कि खुशी के जशन में कितनों के जीवन उजाड दिए।
शरीर कबरिस्तान बन गए, पशु पक्षी व्यपार का सामान बन गए।
हम जिसे जानवर कहते है,उसके आसूं बताते है-वास्तव में जानवर कौन है।सोचके बताओ इसांन कौन है।
©janguly
J