मिट्टी की खुशबू जब रोम रोम में समाती है
तो अनकही सी अनसुलझी बातें कह जाती है
हवाएं प्रकृति की गहराइयों में ले जाती है
और अंतर्मन में आनंद की फसलें लहराती है
बूंदों और धरा के मिलन से जो तरंगें उठ जाती है
वह कानों का प्रकृति से वार्तालाप कराती है
अचानक ही सांसे गहरी हो जाती है
जैसे हवाएं हमारी सूक्ष्मता से मिलने जाती है
वातावरण में रोशनी प्रस्फुटित हो जाती है
और आंखों की पुतलियां मंत्रमुग्ध हो जाती है
ईश्वर के आदेश से ये बूंदे बरस जाती है
और एहसास की गहनता चेतना को छू जाती है।।
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