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प्रतिध्वनि: लय के चार पग

प्रतिध्वनि: लय के चार पग

चंचल ये पादुका,

भागती है हर कही,

और ध्यान मेरा अक्षरों पे,

जो तेरे नेत्रों में है छिपी,

कान बाँधे टकटकी,

निःश्वास रोके भौ-तने,

और कर मेरे भांपती,

तेरे कंठ की थिरकनें,

है चार पग का अंतर,

उसे नाप कर, चल रहे,

है ताल एक, लय सही,

एक धुन में ही जल रहे,

तुम साथ दो तनिक मेरा,

मैं खेल जीत आऊँगा,

प्रतिपक्ष हो विशाल भी तो,

मैं मार्ग खोज लाऊँगा,

हो आस पास मित्र सब,

और तुम सखा, संग मेरे,

ये सात रंग श्वेत के,

है तुमसे आके मिले।