पंखों को खोलना चाहती हूं
कुछ कदम चलना चाहती हूं
ऊंचाइयों पर तो नहीं
मंजिल पर पहुंचना चाहतीं हूं।
कदम चलना तो चाहते है
न जाने क्यूं रुक जाते हैं
शायद कुछ लोग ऐसे हैं
जो मुझको रोकना चाहते हैं।
पहले देखकर, कोमल पंखों को
उड़ने से डरती हूं
फिर इस संसार की
बुरी नीयत से डरती हूं
मैं तो एक पंछी हूं फिर
मुझे क्यूं रोकना चाहते हो
पंख तो मेरे भी पास हैं
फिर क्यूं रोकना चाहते हो।
जानते तुम भी हो कि
घायल कमजोर होता है
जिनमें जुनून हो, उन्हें
पकड़ना भी मुश्किल होता है।
आसां नहीं मुझको पकड़ना
अब तो उड़ने को निकली हूं
भले ही पंख कोमल है
जज्बा पत्थर का लेकर निकली हूं।
कोशिशें हजारों होगी
पर मैं रुकुगी नहीं
देख तूफ़ान के झोंको को
अब घबराऊंगी नहीं।
शान्त उनको भी होना पड़ेगा
जब दृढ़ संकल्प मेरा मजबूत होगा
शान्त तूफ़ान के होने पर
साथ पवन का भी होगा
पहली उड़ान का एहसास
कुछ इस तरह होगा
मन में हर्ष और दिमाग
मे एक विचार होगा।
कि रुकना नहीं मुझको
अब तो उड़ना चाहती हूं
तूफ़ान क्या होता है अब तो
बबण्डर से भी लड़ना चाहती हूं।
©shivanii
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