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पता है मुझे, बख़ूबी जानती हूँ मैं, कि तेरा मेरा साथ लम्हों से ज़्यादा नहीं, कि…

पता है मुझे,

बख़ूबी जानती हूँ मैं,
कि तेरा मेरा साथ लम्हों से ज़्यादा नहीं,
कि तू मेरा मुकद्दर नहीं,
और तुझसे दूर हो जाना ही मेरी नियति है।

फिर भी जाने क्यों,
मेरा दिल हर दफ़ा तेरी ही राहों में मुड़ जाता है,
जैसे ख़ुद से बगावत करके
तेरी तरफ़ खिंचा चला जाता है।
समझाती हूँ इसे, रोकती हूँ बार-बार,
मगर ये मेरी एक भी नहीं सुनता,
अंजाम जानकर भी,
तेरे ख़्वाबों का दामन छोड़ता ही नहीं।

ये कहता है —
इसे बस तुझे ही चाहना है,
हर दुआ में तुझे ही माँगना है,
हर ख़याल में तुझे ही जीना है,
हर रात तुझे सोचकर ही सोना है।

ये दिल कितना ज़िद्दी हो गया है,
हक़ भी नहीं माँग सकता तुझ पर,
फिर भी तुझे अपना कहने की ज़िद करता है,
दूरियों को जानकर भी
तेरे क़रीब होने की फ़रियाद करता है।

जाने क्यों ये बेलगाम हुआ जा रहा है,
हर सोच तुझमें उलझ जाती है,
मैं ख़ुद को समेट लेती हूँ हर बार,
और ये फिर तेरी यादों में बिखर जाता है।

शायद मोहब्बत वही होती है —
जहाँ पाने की उम्मीद कम हो,
पर चाहने की ज़िद कभी कम न हो।


शिवन्या