जिंदगी की इस आपाधापी में,
कब सुबह से शाम हो गई,
पता ही ना चला।
जिन मैदानों में खेला करते थे,
आज वो मैदान नीलाम हो गए,
पता ही ना चला।
कब सपनो को पूरा करने के लिए,
सपनों का घर छोड़ दिया,
पता ही ना चला।
रूह आज भी बचपन में अटकी,
जवानी से कब बुढ़ापा आ गया,
पता ही ना चला।
पैदल चलने वाला बच्चा कब,
बाइक, कार चलाने लगा,
पता ही ना चला।
जिंदगी की हर सांस जीने वाला,
कब जिंदगी जीना भूल गया,
पता ही नहीं चला।
सो रहा था मां की गोद में,
कब नींद उड़ गई,
पता ही ना चला।
एक जमाना जब दोस्तों के साथ,
खूब हंसी ठिठोली किया करते थे,
अब कहां खो गए पता ना चला।
पूरे परिवार के साथ रहने वाले,
कब अकेले हो गए,
पता ही ना चला।
मीलों का सफर कब तय कर लिया,
जिंदगी का सफर कब रुक गया,
पता ही ना चला।
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©vicky
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