ये देह बैठा, किवाड़ खोले
और हर पथिक को बुलावे,
पूछे प्रश्न प्रत्येक से ये
किस ओर तेरा मार्ग जावे?
छांव वृक्ष की ओढ़ कर,
रस कुसुम का बटोरता है
चिंतित उन नेत्रों से,
हर रास्ते को घूरता है
मृदुल स्वर से मनन करे
और अन्तर्मन को नकार दे,
ये देह, चेष्टा की बात कर
मौन को धारण करे,
घाव लपेटे पैर भी,
ले आश्रय इन घास का
किस मार्ग में है कष्ट इतना?
किन कठिनाइयों का हो सामना,
अब थक चुकी ये चक्षुएं,
बेला शाम की है घिर गई,
पथिक, दूर कही न दिख रहा
लगा किवाड़, देह भी फिर गई।