इक सिर्सिरी सी छूट जाती है
वो किताब खोलते हुए
आहट सी दस्तक होती कहीं
दिल के उस कोने पे
लाखो कोशिशों के बावजूद
जब हाथो को ना रोक सका
वो पन्ना खोला
पलभर में वो खुशियों के पत्ते
सब झड़ गए शाखा से
अब आत्मा सूनी सी लगने लगी
अगली किताब लिखने का साहस ना बचा
पलटकर देखा तो कुछ और पन्ने
इसी दास्तां के
जुड़ गए पिछली किताब में ही
खैर,फिर साहस जुटेगा
फिर सावन आएगा
हरियाली फिर दिखेगी
और अगली पतझड़ के इंतजार में
ज़िंदगी का रस हमें समझ आएगा।।
©yash.more
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