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पतंग की डोर

हे ईश्वर
तूने जो मुझे दृश्य दिखाया था...
तो मैं तेरे बातों को समझ गया
कि,
मेरी जिंदगी एक पतंग जैसी,
परिस्थितियों की हवा मे बहेती हुई
एक असीम, अनंत, अविचल भटकन,
और
तेरा प्यार एक डोर जैसा,
मेरे भटकन को दिशा देता हुआ,
एक नम्र, निर्भय, निश्छल नियंत्रण
आज ! वो डोर ढीली है
और मैं कहीं दूर हूँ.....
हां !! पता है मुझे पर,
जब भी तू चाहेगा,
खींच लेगा ये डोर
पास बुला लेगा अपनी ओर.....
और तेरी अगवाही मुझमें पूरी होगी
जैसे तेरा वचन अटल है !
अमीन.
©sunil.
©poet.