नहीं चाहिए आसमा पतंग की तरह,
उचै जाकर भी पछताना पड़े।
उतनी उमंग की फुलावट में भी,
दौर किसी के हाथ में रहे।
नहीं चाहिए आसमा पतंग की तरह.......
क्या छलकने का लाभ एक दिन सब याद करे,
कटी, तूटी, बिखरी, डिब्बे गंदगी में स्थान मिले।
नहीं चाहिए आसमा पतंग की तरह..... .....
खुशी हैं बाल बच्चो का मनोरंजन बनकर,
ए युवाओ की मस्ती का शिकार नही हटता मुझ से।
नहीं चाहिए आसमा पतंग की तरह.........
"संकेत "मैं उँचा रहू मेरी यही कामना,
खूदा के पास शरण मिले, दौर की जरुरत क्या।
नहीं चाहिए आसमा पतंग की तरह..........
डाँ. माला चुडासमा "संकेत"
("में ओर मेरी कविता " से)
©dr.mala
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