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पुराना दौर

पुराना दौर
जब फोन नहीं था हाथों में,
दुनिया सिमटी थी आपसी बातों में।
रिश्तों में महक थोड़ी ज़्यादा थी,
मेरा घर, मेरा अपना थोड़ा ज़्यादा था।

घर के हर कोने में शैतानियों का शोर था,
और मंजर कुछ और था…
वो दौर ही कुछ और था।

जब दौड़ता था सड़क पर चक्का
हमारी पतली सी लकड़ी से,
जब एक साइकिल पर
सारे दोस्त बैठ जाते थे हँसी-खुशी से।
वो सितोलिया और साँप-सीढ़ी के खेल,
जाने कहाँ खो गए…
अब दिलों में है कितने मैल
हम क्यों इतना बदल गए।

हर कोने में सिमटी थीं कुछ अलग बातें,
सीढ़ियों पर बैठकर होती थीं बचपन से मुलाक़ातें।
चाय में रोटी भिगोकर खाना भी एक इश्क़ था,
वो दौर था जब जुबान को ब्रेड टोस्ट का चस्का न था।

वो भी एक दौर था
जब टीवी ब्लैक एंड व्हाइट था,
परज़िंदगी में प्यार का रंग
कुछ ज़्यादा ही ब्राइट था।

दोस्त-यार सारे ऑफलाइन होते थे,
ऑनलाइन का कोई ज़माना न था।
जब होली में होती थी हुड़दंग,
और दिवाली पर मिलते थे गले,
आज ऐसा वक़्त है कि
अपने घर में भी माता-पिता से कम ही मिले।

ये स्टेटस लिखने का दौर है,
वो दिल पढ़ने का दौर था।
वक़्त शायद कम था चीज़ों में,
पर अपनों के लिए बहुत था…

सच कहूँ तो—
सादगी में जो खुशी थी,
वो आज की रफ्तार में कहाँ…

और दिल बस यही कह उठता है—
वो पुराना दौर था,
वो सुनहरा दौर था,
वो अपना दौर था…
जी…
वो पुराना दौर था।

-शिवन्या