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पुराना दर्द उभर आया ऐसी हवा चली ।

पुराना दर्द उभर आया ऐसी हवा चली
गुजर रहा था मैं जब होकर यार की गली।
हर याद ताजे हो गए लम्हों के पन्ने खुल गए
सामने आयी फिर वो नजरों के मेरी मनचली।
क्या गुनाह किया ऐ खुदा मुझसे तुने छिन लिया
वो जो भी थी मेरी थी अपनी थी बुरी-भली।
अब क्यूँ किस लिए दौड़ा रहा लहूं मेरे नफ़स में
बेजान जिस्म ये फकत रूह तो कब के निकल चली।
ख्वाब,ख्वाब ही रह गए जिंदगी उलझ गई
ऐसे मेरे नसीब पर वक्त की छुड़ी हली।
©anuragrahi