प्यार, इश्क़, महोब्बत
प्यार, इश्क़, मोहब्बत…
कहने को तो बस चंद अल्फ़ाज़ हैं,
मगर हक़ीक़त में ये रूह का एक बे-रहम इम्तिहान हैं।
इश्क़ एक समंदर है—
बे-किनारा, बे-इंतिहा, और ख़ामोश।
जो इसमें क़दम रखता है,
वो धीरे-धीरे ख़ुद को खो देता है।
शुरू में लगता है जैसे जन्नत मिल गई हो,
हर लहर में सुकून सा महसूस होता है।
मगर फिर एक वक़्त आता है
जब वही लहरें दिल को चीरने लगती हैं।
इंसान बहुत हाथ-पैर मारता है,
साहिल की तरफ़ लौटना चाहता है,
मगर इश्क़ की गहराई
किसी को इतनी आसानी से रिहा नहीं करती।
कभी रात भर की बेचैनी,
कभी ख़ामोशी में घुलती हुई तड़प।
दिल ज़ख़्मी, रूह थकी हुई,
और ख़्वाब धीरे-धीरे मर जाते हैं।
फिर एक सच समझ आता है—
इश्क़ से बचना मुमकिन ही नहीं।
जो एक बार इस समंदर में डूब जाए,
वो या तो फ़ना हो जाता है…
या फिर उम्र भर
अपने ही जज़्बात का क़ैदी बन कर जीता है।
और सबसे गहरा दर्द ये है—
इश्क़ अक्सर मुकम्मल नहीं होता,
मगर फिर भी
इंसान उसी के लिए जीता और उसी में जलता रहता है।
✍️शिवन्या
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