प्यार थोड़ा खुद से कम तुझसे कुछ ज्यादा हो गया
मर्गे वस्ल ज़ख्में सुखन अपना कुछ जाली इरादा हो गया
वो एक चाँद जो अपने दरीचे में था पूरा का पूरा
मिरे अश'आरों सा वो भी बेअम्माँ और आधा हो गया
इतना भटका हूँ उस कूचे पर यादों के खिलौने लेकर
तू कहता था वाइज़ जिसे वो और भी नादाँ हो गया
क्या तुझे अब याद नही वो रातें और वो सफ़क़ चाँद
इतनी भी क्या सदाक़त खैर तू इतना कुशादा हो गया
अब तो ये आलम हैं तेरे कूच-ओ-खिलवत के सनम
लोग कहने लगे क़ाबा क्या तू सच में ख़ुदा सा हो गया
अब तो इस जीस्त से ज़िंदा होने की कोई वजह नही रही
ये मेरा ख्याल नही है 'अमन' चारगारों का वादा हो गया
-अमन वर्मा "अमन"
मर्गे वस्ल,ज़ख्में सुखन-विरह की मौत , शब्दों के जख़्म
दरीचे-खिड़की , बेअम्माँ-असुरक्षित , वाइज़-शिक्षित , सदाक़त-सत्यता , कुशादा-विस्तृत
खिलवत-व्यक्तिगत रहने की जगह ,चारगारों-वैध , चिकित्सक
©amnakku
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