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प्यार तो था...

कुछ बात थी उसमें
जो खिंचती थी उसकी ओर
कुछ कसक रहती थी दिल में
टूटती नहीं थी हमारी डोर
लड झगड कर बैठ जाते
मुंह फुलाकर अपना राग अलापते
फिर यूं हीं घुल मिल थे जाते
जैसे है काली घटा में नाचता मोर
कोई भी हो बात चाहे
कोई भी हो मुलाकात गाहे
हर किसी का एक हीं अंजाम होता
वो रूठकर जाती मेरा इल्जाम होता
पर हरेक शय यही लगता है
कुछ न कुछ है रूहानी
गर ये न होता कभी की
खतम हो जाती अपनी कहानी
दूर हो या पास मेरे
होता वो मेरी रातों का भोर
कुछ बात थी उसमें
जो खिंचती थी उसकी ओर
©newera