राधे.....
राधे…
जब टूट रही थी मैं,
तूने मुझे संभाला।
जब डूब रही थी मैं,
तूने मुझे निकाला।
दुखों के भँवर में थी,
कोई किनारा न था।
सब थे पास मेरे,
पर कोई सहारा न था।
आँसुओं का समंदर था आँखों में,
और दिल में आग का दरिया।
डूबने का डर भी था,
और जलने का भी खतरा।
दुविधा में फँसी थी मैं,
चेहरे पर कोई हँसी न थी।
तूने ही मुझे उबारा,
तूने ही मुझे निखारा।
अब तेरे नाम से साँसें चलती हैं,
तेरे नाम से हँसी खिलती है।
आँखों में चमक तेरे नाम की है,
दिल की हर धड़कन तेरे नाम से है।
तेरा चेहरा देखूँ तो सब भूल जाती हूँ,
तेरे चरण निहारूँ तो कुछ याद न रहता है।
तू आँसुओं की धार बनकर
मेरे गालों को सहला जाती है,
और आँचल भिगोकर
मुझे शीतल कर जाती है।
राधे…
एक तमन्ना बाकी है अब—
मिल जाओ मुझे कहीं किसी दिन
अपने माधव के संग।
किसी लीला में जब खेल रहे हो
प्रेम के रंग।
निहाल हो जाऊँ निहार कर
युगल छवि तुम्हारी।
मर जाऊँ, मिट जाऊँ,
जाऊँ वारि-वारि।
बुला लो अपनी शरण,
लगा लो हृदय से मुझे।
रख लो सदा के लिए संग,
चूमती रहूँ तुम्हारे चरण।
बुला लो निज धाम, किशोरी,
बुला लो निज धाम, श्यामा।
रख लो दास बनाकर मुझे,
चाकरी करती फिरूँ सदा।
हो जाऊँ निहाल राधे,
तेरी युगल छवि पर।
बलिहार जाऊँ राधे,
सौ-सौ बार राधे…
✍️शिवन्या
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