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रानी! मुझसे नैन मिलाकर देखो।

रानी! मुझसे नैन मिलाकर देखो
इक बार ये धोखा खा कर देखो।
नज़रों में क्या भेद छुपा है
इसका पता लगाकर देखो।
सामने हो कर भी दुर रहती हो
अब तो ज़रा पास आ कर देखो।
किसी पुरानी यादों के साये में
मुझको घर बुलाकर देखो।
इस हंसी शाम में चुप बैठी हो तन्हा
मेरे ग़ज़ल तो गुनगुनाकर देखो।
हिज़्र के दिन हमारे बड़े रहे
इस फ़िराक़ को हराकर देखो।
बिन अनुराग जाग जाग कर रात काटी हों
इस बार निंद की डाल को हिलाकर देखो।
यह कविता उनको समर्पित जिन्से मैं चाह कर भी अपने प्यार का इजहार नहीं कर सकता, अगर उन तक पहुंच जाएं तो उनसे मेरी इल्तज़ा है कि वो मेरे जज़्बात को समझें और मुझसे ब्यां करें।
©anuragrahi