कल रोज़ वाले रास्ते से ही गुजर रही थी, पर मेरा शहर मुझ से ज्यादा तुम्हारासा लगने लगा है। उस नुक्कड़ पे हाँथो में गरमाहट सी महसूस हुई , जहा पहली दफा तुमने बिना पूछे मेरा हाथ थामा था, वो ऑटो में बैठते ही तुम्हारा मुजे अपनी बाहों के घेरे में महफूज़ कर लेना, रास्तों पे चलते वक्त यु हाथ थाम लेना, मेरा शहर अब मेरा है ही नही, हर एक नुक्कड़ पे हम है।
वैसे अबमें भी कहाँ मेरी हूं, खुश्बू में तुम्हारी मेने अपना मिजाज घोलकर ख़ुद को नया सा पा लिया है।
©mishti
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