क्या शोर मचा है जग में
क्यों होड लगी जीवन की
सब कुछ तो है हवा में
क्यों हुई कमी आक्सीजन की...।
रब के बनाए हम पुतले हैं
कुछ गोरे , काले,उथले हैं
रब ने भरपूर दिए साधन
हंसमुख रहे सबका आनन
पर दानव को भी जगा दिया
जो भी था सब लुटवा दिया
जो सामने है अब मिलता नहीं
रब तेरा भी अक्श कहीं दिखता नहीं
लगता है सब छिन लिया हमसे
लगता है रब रूठ गया हमसे...
जीवन तो उसकी रहमत है
दानव की कैसी वहशत है
कुछ तो छोड दी है लगाम
जग में फैली कैसी दहशत है
अब अर्जी भी नहीं सुनता हमसे
लगता है रब रूठ गया हमसे...
फिर कब होगा सुंदर विहान
उन्मुक्त गगन धरा का मिलान
कब मानव का मानव से होगा जुडाव
कब दूरियों का आएगा पडा
लग रहा अनंत का प्रश्न 'अभय'
खुशियों का होगा कब वसंत
रब का बंधन टूट गया हमसे
लगता है रब रूठ गया हमसे...
©abhidilse
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