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तेरे लिखे हुए अक्षर
धीरे-धीरे
मेरे दिल में उतरते गए,
और मैं
उन्हें सच मानती चली गई।
जाने कैसे
वो कोरे शब्द
सच की तरह लगने लगे,
और तेरी झूठी मोहब्बत की तरह
मेरी रगों में
धीरे-धीरे घुलने लगे।
कहाँ जानती थी मैं
कि ये सब
शब्दों का जाल है,
कुछ वैसा ही
जैसे कोई शिकारी
मासूम परिंदों के लिए
दाना बिखेरता है।
तुमने भी तो
शब्दों का वही दाना बिखेरा था,
मेरी रूह को
अपने पास बुलाने के लिए।
और मैं…
मासूम परिंदे की तरह
उन्हीं शब्दों पर भरोसा करके
तेरे पास चली आई।
पर रूह में उतरकर
किसी को यूँ तन्हा छोड़ देना
मोहब्बत नहीं होता।
किसी को खामोश दर्द में
टूटने के लिए छोड़ना नहीं होता ।
अब समझ आई है मुझे
एक कड़वी सच्चाई—
कि शब्द
कभी-कभी बेहद खूबसूरत होते हैं,
पर हर खूबसूरत शब्द के पीछे
सच्चा प्रेम नहीं होता।
क्योंकि सच तो यही है—
शब्दों का खेल
प्रेम नहीं होता।

✍️शिवन्या
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धीरे-धीरे
मेरे दिल में उतरते…