रहमत-ए-दीदार
तू जो मिला तो यूँ लगा
जैसे डूबती हुई कश्ती को साहिल का निशाँ मिल गया हो,
जैसे सदियों से तिश्ना रेगिस्तान की रेत पर
रहमत की कोई पहली बूँद ठहर गई हो।
जैसे भटके हुए हिरन की मृग-तृष्णा
आख़िर हक़ीक़त का रूप धर गई हो,
जैसे मेरी तन्हा रूह को
मंज़िल-ए-सुकूँ का रास्ता मिल गया हो।
तेरी एक झलक ने कुछ यूँ असर किया
कि दिल की वीरान बस्ती में बहार उतर आई,
जो धड़कनें कल तक ख़ामोश थीं
आज उनमें तेरे नाम की सरगोशियाँ बस गईं।
तेरे लफ़्ज़ मरहम बनकर उतरे
मेरे बरसों पुराने ज़ख़्मों पर,
तेरी आहट किसी दुआ की तरह
मेरी तन्हाई के आँगन में ठहर गई।
अब मेरी हर सुबह
तेरे ख़याल की रौशनी से निखर जाती है,
और हर शाम
तेरे ज़िक्र की नरम चादर ओढ़ लेती है।
मेरी रूह के सूने सहरा में
तेरी मोहब्बत का चश्मा फूट पड़ा है।
मगर कभी-कभी
दिल की गहराइयों में एक सवाल लहराता है —
क्या तू मेरी किसी भूली-बिसरी दुआ का जवाब है…
या मेरी क़िस्मत की किताब में
तेरा नाम पहले ही लिख दिया गया था।
क्योंकि अब मुझे यूँ महसूस होता है —
कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में
सिर्फ़ मिलने नहीं आते…
वो आते हैं
ताकि हमारी बिखरी हुई रूह को
अपने एहसास की ख़ामोश रौशनी में समेट कर
उसे मुकम्मल कर दें।
और शायद…
मैं भी तेरी वही अधूरी दास्तान हूँ
जिसे मुकम्मल होने के लिए
मेरे नाम की ज़रूरत थी।
✍️शिवन्या