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रहस्यमयी कविता

कहते हैं तुझे एक पत्थर की शिला
उसी शिला मै है एक फूल खिला
अब हो गई जो आधारभूत शिला
उसी में बना था एक पुराना किला
किसने किया था ऐसा गिला।
वहां रहता एक धूर्त जो मिला
चल अब तू उसको छाछ पिला।
टीला वहां टीले में दूसरा टीला
किसने दिया उसको इतना ढीला।
था वो एक रंग निराला
चहुं ओर था उसके उजाला
किसने ये अनर्थ कर डाला
था उसका तेज़ चमकीला
छूकर खुद को जला डाला
उसमे थी एक ऐसी ज्वाला
भस्म हो चुकी थी वो शिला
गा रही थी जहां एक कोकिला
सुर था जिसका बहुत सुरीला
बैठा था एक वृद्ध पहन मृगछाला
घूंट घूंट कर पी रहा था मधुशाला
देख रहे थे सब उसकी ये लीला
खाता वो रोज पान मसाला
सब जगह थू थू कर डाला
था नहीं वहां उससे कोई भिड़ने वाला
क्यूंकि वो था एक भूत पिशाच वाला।
©anusingh