वक्त की मार से,
वक्त ही बदल गया।
अश्रु की धार से,
मन का भार उतर गया।
पर व्यथित हूं आज मैं,
इतना क्यू उदास हूं मैं।
काल के खेल में,
हार का प्रमाण हूं मैं।।
इस हार जीत के जाल मे,
इतना क्यू फस गया?
अन्य के स्थान में,
अनन्य क्यू रह गया।।
अब बस बहुत हुआ,
अकेलेपन से थक गया।
विवशता के भार में,
अक्षम्य पाप कर गया।।
रोदन के अवशेष में,
नाम ही तो शेष है।
ईश्वर से मिलन में,
बस थोड़ी ही तो देर है।।
विधि का विधान था,
विवश जो में हो गया।
विचार के प्रकोप में,
आत्मघात कर गया।।
(शिवांश ओझा)
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