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रिश्ता

वह काफी दुनिया देख तो चुका था पर जानता था कि अभी भी नादान है। पिता की बात को अनसुना कर वह अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगा। तर्क वितर्क से घिरा दिमाग उसके पिता की लाचारी को भी नकारने लगा। पर उसके इस आचरण से जकड़ा हुआ दिल सारे शरीर को समेटकर फूट फूट कर रोना चाह रहा था। दिल और दिमाग का आपसी विद्रोह उसके भनभनाते हुए कदमों से नज़र आने लगा।
कमरे का दरवाज़ा पटकते हुए ज़रा दिमाग को शांत तो किया पर अब बारी पसिजते हुए दिल की थी। रोने का गुबार फूट पड़ा और उसकी आंखो ने भी साथ देने में कोई कसर ना छोड़ी। आख़िर तकिए पे गिरे वो आंसू बस लाचार होकर रात भर मदद की गुहार लगाते रह गए।
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