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रोते पेड़

रोते हुए पेड़ ने कहा, 
मैं कटने के डर से नही रो रहा हूँ। 
रो रहा हूँ मै मनुष्य की बर्बरता से, 
डर रहा हूँ मैं कैसे जिएगा मनुष्य हमारे बिना।
रो रहा हूँ मैं इसलिए, 
जिसे मैंने छाँव दी 
जिसे हमने फल दिया 
जिसे हमने शुद्ध हवा दिया 
वही मनुष्य हमें काट दिया 
रो रहा हूँ मै इसलिए, 
जिसके लिए हमने धूप सही 
जिसके लिये हम तूफ़ान सहे 
जिसके लिए हम वर्षा लाये 
वही मनुष्य हमें काट रहे
रो रहा हूँ मैं इसलिए, 
मनुष्य अपनी मनमानी से जंगल रहा हैं काट 
जिससे पेड़ पौधें हो रहे हैं समाप्त 
ये देखकर मेरा मन रो रहा हैं 
विनती हैं मेरी मनुष्य से, 
काटो हमे दुख नही 
अपने लिये हमें बचाओ 
एक पेड़ काटो तो दस पेड़ लगाओ 
जंगल और जीवों को बचाओ 
तभी मैं हसूंगा, 
वरना रोटा रहूंगा
         
         रोते पेड़- चरन सिंह
©charan