सारे कपड़े उतार कर,
कभी अपनी नज़र में झांक तो।
तेरे हुस्न को किसी ने कितनी,
शिद्दत से तराशा है।
फेंक उतार कर,शर्म हया का ये लिबास,
कभी तु,छु अपने रोम को,कभी छु अपने मन को भी।अभी,
हां जमीन से दूर कर,ताकते बेरंग आकाश को,
कोई जिस्म पर अभी,कोई पर्दा ना रहे,
किरणे राह खोजती,भेदती रुह तलक।
आग लगा लें जिस्म को,आग लगा दे जंगल में।
जंगल में टहलती एक हिरण,खींच लाएगी रोशनी कि किरण।
कोई पत्ता न पुछेगा,कि पतझड़ क्यु आया था।
सावन कि बुंदों ने भी,रुबरु कराया है आप से।
🥀कवि:-अभय ना. ताकसांडे🥀
©abhayt
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