रूक जाओ मेरे गर्दिश में और दो चार दिन
बस इतनी सी गुजारिश है और दो चार दिन।
मेरे न हाथ उठते थे और न पैर हिलते थे
बजने दो इस दिल में रबाब और दो चार दिन।
किसी मकतब में पढ़ा है सफीने निगाह भी है
सिखा दो निगाह से रस्म-ओ-रिवाज और दो चार दिन।
तुम्हें किस बात की जल्दी है अभी बाहर बहुत सर्दी है
होने दो मुझे भी गर्मी का एहसास और दो चार दिन।
ये हुस्न-ए-मुजस्सिम है जमीं पे मेरे लिए आई
फैला दो नुर-ए-मुजस्सिम दिल में और दो चार दिन ।
न तेरा कोई रोब से मुतअल्लिक न बाबस्ता गरूर से कोई
बढा लो अनुराग से रिस्ता प्यार का और दो चार दिन।
अर्थ - (रबाब-सारंगी, मकतब-स्कूल, सफीने-किताब,हुस्न-ए-मुजस्सिम-अवतरित सुन्दरता, नुर-ए-मुजस्सिम-अवतरित रोशनी, मुतअल्लिक - संबंध रखने वाली, बाबस्ता - संबंध)
©anuragrahi
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