D

रुतबा-ए-मोहब्बत तो देखो.....

लोग करते हैं नशा, गम भुलाने के लिए
हम ने भी किया एक नशा,
तेरे गम पाने के लिए...
सूख कर भी गिरे नहीं शाख से
बस एक तुझे गले लगाने के लिए..
रूतबा-ए-मोहब्बत तो देखो
सब कुछ हार गए हम,बस एक उसे पाने के लिए..
सोचा था यकीनन वो भी चाहेंगे हमें
मगर वो खोये रहे किसी और रूठे को मनाने के लिए..
ठाना फिर हमने भी, उन्हें उनकी
खुशी से मिलाने के लिए...
चाहों दिशाएं छान डाली, उसके
चेहरे पे मुस्कुराहट लाने के लिए...
देख खुश उसे किसी और की बाहों में
फिर अपने गम मिटाने के लिए,
दर पर पहुंचे उसके, यहाँ कभी
अंधेर नहीं किसी दीवाने के लिए...
पूछा उससे चीख कर, बता
क्या कमी रह गई मुझसे, तुझे मनाने के लिए...
वो भी ऐसे मुस्कुरा कर बोला,
जैसे आया हो जले पर नमक लगाने के लिए...
कहा उससे कुछ तो रहम कर अब मुझ पर
उसने ले लिया अपने रहमो कर्म में हमें...
आखिर राख हुए हम ,खुद को मिट्टी में मिलाने के लिए...
आखिर राख हुए........
©deeprichu