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रूह की बेक़रारी

रूह की बेक़रारी

ये कैसी चुभन है दिल की तहों में उतरती हुई,

ये कैसी हलचल है जिस्म के हर ज़र्रे में मचलती हुई।

ये कैसी बेचैनी है कि रग-रग में इक साज़ बजता है,

ये कैसी बेताबी है कि रूह भी सुकूँ से कतराती है।

साँसों में जैसे कोई अनकही सी सरगोशी घुली है,

निगाहों में जैसे कोई ख़्वाब चुपके से पला है।

दिल की वीरान गलियों में आजकल अजीब रौनक है,

जैसे किसी के क़दमों की आहट ने शहर-ए-दिल को जगा दिया हो।

क्या ये इश्क़ की पहली दस्तक है मेरी चौखट पर,

या बसंती फ़िज़ाओं का कोई दिलफ़रेब जादू।

जहाँ हर कण-कण नया लिबास ओढ़े मुस्कुरा रहा है,

जहाँ हर शजर, हर कली अपने हुस्न का इज़हार कर रही है।

हवाओं में भीगी-भीगी सी महक-ए-तमन्ना तैरती है,

फ़िज़ा में किसी दीदार की आरज़ू लहराती है।

हर रूह अपने महबूब की आग़ोश में सिमटना चाहती है,

हर दिल किसी हमनवा की आहट को तरसता है।

तो बताओ ऐ दिल-ए-बेकरार, ये कैसा आलम है—

क्या ये बस मौसम-ए-बहारा का असर है,

या मेरी मोहब्बत की वो गहरी कसक

जो रूह की गहराइयों से उठकर

मेरी हर धड़कन को तुम्हारा नाम बना देना चाहती है।


✍️शिवन्या