S

रूठे बादल

रूठे बादल
बादल बरसाते हैं पानी,
यह तो बहुत बड़े हैं दानी।
जो धरती की चूनर धानी,
रंगते हैं, बतलाती नानी।
पता नहीं तुम क्यों रूठे हो?
लगते बहुत बड़े झूंठे हो ।
सूख गईं हैं फसलें सारी,
बिन पानी के नदिया हारी।
पनघट, नलों, निर्झरों का जल,
कम होता जाता है प्रतिपल।
टहल रहे हैं यह दल- के- दल,
पर सब -के -सब सूखे बादल।
आओ-आओ अब तो आओ,
जमकर के पानी बरसाओ।
तुम धरती का करो श्रृंगार,
हम सब पर होगा उपकार।
सतीश मिश्र
खुटार
शाहजहांपुर उ०प्र०
२४२४०५
९८३८५१०१६३
©satish