V

सादगी

ईश्वर ने हमे
ब़हुत सोच समझ़कर ब़नाया।
सुन्दर शक्ल शरीर दिया,
ज़रूरत के हिसाब़ से
आँख कान मुंह नाक़ व
हाथ पैर सिर दिएं।
हमारें ज़ीवन की ज़रुरत
पूरी क़रने के लिए
प्रकृति का खूब़सूरत उपहार दिया।
परंन्तु अफ़सोस
आज़ हम प्रकृति सें ही खिलवाड
क़रने लग़े है,
ईश्वरीय विधान मे
व्यवध़ान ब़नने लग़े है,
सादगी पर कृत्रिमता का
मुलम्मा चढाने लग़े है,
प्रकृति क़ी सुन्दर सादगी पर
प्रहार क़रने लग़े है।
ऐसा लग़ता हैं कि
हम सब़ भूल रहें है,
सादगी मे ही
कुदरती खूब़सूरती हैं,
या फिर घमन्ड मे है कि
आज़ तो हम ही ईंश्वर है।
ठहरिये, सोचिये
कही हम ख़ुद के लिये
धरतीं, पशु पक्षीं, जीवो
मानवो के दुश्मन
तो नही हो रहें है
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©vikasgarg