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साकी तेरे निगाह को हम मयखाने आ गए।

साकी तेरे निगाह को हम मयखाने आ गए।

साकी तेरे निगाह को हम मयखाने आ गए

मतलबी है लोग यहां तुझे भी आजमाने आ गए

गुल-ए-ग़म का आज़ तू इक प्याला पेश कर

मुहब्बत में भरी जाम़-ए-जहर से पिने पैमाने आ गए

काटी है उनके इंतजार में हमने कई शब

तन्हाई जुदाई फुरकत हिस्से मेरे ये सब नज़राने आ गए

जिन पर पड़ न सका मेरे उल्फत के साये का असर

ग़ज़लों में ढाल कर दर्द-ए-दिल को सुनाने आ गए

अनुराग यही मक़ाम है तेरे इकतरफा इश्क का

अपने भी इस मक़ाम पर बन के अनजाने आ गए।