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" सार्थकता "

ऐ राही तू निकल जाना
राहों को अपनी इबादत बनाना
खुद को हर पल बेहतर बनाना
जमीर से हर पल मिलकर आना
खुद से ही तो उम्मीद लगाना
और उनसे ही तू निखर जाना
किसी और के लिए अच्छा कर जाना
पर अच्छा ही पाने की चाह ना लगाना
सुंदर से ख्वाब को हकीकत बनाना
जिसने तुम खुशियां बांटते नजर आना
मुस्कुराहट का घर लोगों के भीतर बनाना
पर प्रतिक्रिया की मन में उम्मीद ना लाना
बहते पानी के साथ बह जाना
और खुशियां नए-नए लोगों के दामन में भर आना
यही तुम खुद को पाठ पढ़ाना
और गुरु शिष्य का साथ निभाना
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