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" साया "

जीवन है साया
सोचो जरा इसने साथ कहां तक निभाया
फैली है जहां में निश्चित समय की माया
माया ने दिखलाई है रंगों की काया
काया ने है बंधनों में उलझाया
उलझन को आपने हर पहर है अपनाया
दुखों के सागर में खुद को डुबाया
और साए की गहराई से पार न पाया
ईश्वर ने पार पाने का माध्यम है दिखाया
और भीतर में प्रवेश करने का उपाय है बताया
यह तुझ पर है कि तू इस उपाय को ,
महसूस कहां तक कर पाया
महसूस कहां तक कर पाया ।।
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