*सब कुछ है पराया*
दुनिया रूपी इस नगरी में सब कुछ मैंने पाया
कोई लगा मुझे अपना और कोई लगा पराया
अपनेपन का अनुभव कुछ लोगों मुझे कराया
उपेक्षा करके कईयों ने कर दिया मुझे पराया
गीत प्यार का गाने के लिए मैंने रोज बनाया
लेकिन मेरे संग किसी ने आज तक ना गाया
झूठी नींव भरे जीवन में खुद को मैंने फंसाया
जन्म जन्म खुद को मैंने कितना है उलझाया
अपना नहीं कुछ भी यहां सब कुछ है पराया
बड़ी देर बाद मुझको ये सच समझ में आया
तब यही लगा ये संसार हुआ मेरे लिये पराया
आखिर इस दुनिया से मैंने कुछ भी ना पाया
काहे को मैं इतराऊँ जब अपनी नहीं ये काया
ये तन भी मुझे लगता है जैसे बेटी धन पराया
*ॐ शांति*
©mukeshmodi
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