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सच

मन मुक्ति सुधा की प्यास लिये
जब ह्रदय विदारित हो जाय
तब सुख के बरसें बादल भी
तो उसमें कोई सार नहीं
वज्र - वचन सुनते सुनते
जब मन ही घायल हो जाए
तब सुमधुर वाणी भी आती हो
तो उसमें कोई सार नहीं।
भूखा, श्रम से सूखा तन जब
हो रुग्ण धरा पर गिर जाय
तब अमृत के भंडारे हों
तब उसमें कोई सार नहीं
लालच विष का आवरण ओढ
संबंधों की बलि ले जाए
तब सुख में वो यदि लौटे भी
तब उसमें कोई सार नहीं
धनधान्य सुलभ होने पर भी
यदि हृदय प्रेम का प्यासा हो
वैभव के अगणित झरने हों
तो उनमें कोई सार नहीं
अगणित खुशियों के सुन्दर पल
हरदिन ही बीते जाते हों
तब सुख की खेती करने में
रह जाता कोई सार नहीं
"उमाशंकर" 🌷
©yogamity