क्यूँ हैरां नही हुँ अपनी चाहत पर
भुला बैठी हुँ खुद को जो मुद्दत से
करूंगी रिहा कैसे उन एहसासों को
सँजो रखे हैं रूह मे जो हिफाज़त से
बन बैठे हैं जो कब से खुदा पथर के
क्यूँ तंग नही आते वो इबादत से
रुस्वा होकर भी नाम लेता मेहबूब का
इश्क़ लाचार है क्यूं अपनी फितरत से
भरी बज्म मे हो जाते हो गुम कहीं
आबाद तन्हाईयों मे ख्यालो की आदत से
देख किसी और संग उन्हें तुफान सा उठता
जफ़ाएं सनम की कम नही कयामत से
थी आरज़ू की भुल जाऊँ उन्हे
भूलने को याद कर रही हुँ कितनी शिद्दत से
खिलेंगे गुल फिर आएंगी बहारें जब
नज़र ना फेर लेना तब सच्ची मोहब्बत से
©riyajangra
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