सड़के भी क्या दिखाती है उन्हें,
जो उत्सव की निकटता में अपनी कला को संजोया करते हैं...
और अपनी कारीगरी से मिट्टी को मनमोहक मूर्तियों में बदला करते हैं.....
जब वह मूर्तियों को सड़कों पर सजाया करते हैं तो अपने चेहरे की चमक को उनमें उतारा करते हैं .....
जब गुजरते लोग देखते हैं उन्हें तो अपनी कला को उन्हें सौंपने की आस में रहा करते हैं...
मूर्तियों के ढेर में जब कोई कमी नहीं आती तो अपनी नजरों को खुद से चुराया करते हैं...
लोगों के चुनाव के परचम पर जाकर अपनी कलाओं की कतार सजाया करते हैं....
1 दिन के उत्सव के इंतजार मैं खुद को कई दिनों तक पसीने में भीगाया करते हैं....
उनकी आंखें उस दिन के हर गुजरते पहर को बयां करती है जिसको ठहराने की वो चाह किया करते हैं....
अगले दिन जब वह मूर्तियों को समेटा करते हैं तो अपनी आंखों में अपने परिवार के दृश्य को भरा करते हैं .....
इस चकाचौंध की दुनिया में वो अपने हर रंग को मूर्तियों में भरकर भी अपनी मायूस निगाहों से उनको गिन कर और थैले में भरकर वहां से कहीं दूर निकल जाया करते हैं |
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