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शाख पे रहा वो शाख से कभी उतरकर नहीं देखा।

शाख पे रहा वो शाख से कभी उतरकर नहीं देखा
जिंदगी के मायने को कभी समझ कर नहीं देखा।
हर वक्त अपने धुन को ही गाता रहा अक्सर
दुनिया में कई धुन है उसे कभी सुनकर नहीं देखा।
वतन के लिए मरते हैं उनपे उठाता है उंगलियां
वतन के लिए वो कभी मर कर नहीं देखा।
जिंदा है फरेब अब तो धरनों में प्रदर्शनों में
जो बनें है किसान वो कभी खेतों में चलकर नहीं देखा।
आज तक देखा है भागते चोर डकैत व आतंकियों को
पुलिस को तो भागते हुए कभी डर कर नहीं देखा।
अब कुछ तो इलाज होना चाहिए इन दंगाइयों का
अनुराग ने गद्दारों को पिटाते हुए कभी जमकर नहीं देखा।
यह ग़ज़ल राहुल गांधी के जीवन चरित्र पर लिखी गई है।
©anuragrahi