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शाम के बाद .....

लबों पे आया नही कोई नाम
कभी उस नाम के बाद
मिलाते वो नज़र किसी से कैसे
पी नज़रो के जाम के बाद
कभी जो गुलमोहर के तले
वफ़ा की कसमें खाते थे
किया गया ना दरख्तों को सलाम
उनके अंज़ाम के बाद
टूटे ख़्वाबों पे जो करीने से
करते थे कारीगरी
दिखाया गया ना उनसे हुनर
उस एहसान के बाद
हुअा करते थे मियां हम भी
शान किसी महफ़िल के
जलाई गईं ना फ़िर शमां उन
आँखों के फ़रमान के बाद
जाओ जहाँ है जानां
के तुमको है हक इसका
होगी कहाँ क्या कोई
मंजिल उस मुक़ाम के बाद ...
©dilsere