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" शांति "

समंदर ने हमसे कहा चल बह चल मेरे साथ तुझे किनारे तक पहुंचा दूं
तेरे सिर पर मैं मुकाम का ताज सजा दूं
तुझे भी मैं कामयाबी का हार पहना दूं
तू चल मेरे साथ तुझे कश्तियों की सैर करा दूं और,
तेरे भीतर से तुझे मिला दूं
......
मैंने भी कहा - तू ले चल मुझे दूर कही
जहां कोई शोर नहीं और
मन में उलझी उनकी कोई डोर नहीं
जहां हो शीतल छांव कहीं और
भीतर में कोई भाव नहीं
मुस्कुराहट पर कोई लगाम नहीं और
ईमान से कोई बेईमान नहीं
सुंदर सा हो कोई मकान कहीं
जहां इंसान में कोई अभिमान नहीं
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