खोई हुई थी रातें कही,
और अंधेरा कुछ बाकी था,
कहानी मेरे इश्क कि खत्म हो गई,
फिर भी कहना कुछ बाकी था।
लब्ज थे मेरे खोएँ कही,
और आँखों में नमीसी कुछ बाकी थी,
ढुंढती है नजर जिसे मेरी भीड में,
पहचान उस शक्स कुछ बाकी थी।
मुडते हुए क्या खूब वह मुस्काई,
अभी पूरी झलक उनकी बाकी थी,
सोचते रहते थे हम हरपल जिन्हें,
वह सामने मेरे खडी थी,
बस थोडा मुडना कुछ बाकी था,
की अचानक वह गिरने लगी,
हम चाहते उनको सम्भालना,
और खुद पलंग से गीर गए।
- निलेश इंगोले
©nilesh2016
N