उड़ते हुए शब्दों को पकड़ मन पिंजर में बंद कर,
शांत एकांत में बैठ जुगाली का आनंद लिया कर,
कुछ कटीले कुश सम कंठ को घायल कर,
तो कुछ नरम घास सम जठरानल को शांत कर,
मन-मस्तिष्क, हृदय से जन्मे ये
कुछ आड़े-तिरछे से कुछ शालीनता की चादर ओढ़े,
चौकड़ी जमाये, मुख द्वार पर बैठे कुछ सम्मान ओढ़े,
डोर को थामे कुछ खुद में समायें,अनोखे जादूगर,
मन शांत रखने में सहायक गीतों का आनंद देकर,
मन शांत रखने में सहायक सम समीपस्थ,
उड़कर मन के पंछी, वापस ले आते पथ,
ममत्व को कानों में मिस्री सा घोल देते हैं,
दंतहीन होकर भी विषैले दर्द का अहसास देते हैं,
निर्मल नैनों से अश्रुधार बहा उतावला कर देते हैं,
विकास के नये आयामों से जोड़ देते हैं,
कबीर के ढाई आखर की महिमा
कण कण में व्याप्त हो
बिखेरती सिंदूरी रंग
चढ़कर सीढ़ी पर
देख लिया विस्तृत संसार
बिन आखर बिन शब्द के
रामायण, गीता, वेद, कुरान
गुप्त रह बेमोल हो जाते।
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©vikasgarg
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