D

शब्दों की रंगोली

मैं अपनी कविता के भीतर
जोड़ना चाहता हूँ ऐसे कई शब्द
सिर्फ जो शब्द ही न हो /
बल्कि मुकम्मल रूप का प्रतीक हो
शब्द की छाया में पूरा जीवन हो
मैं अपनी कविता के लिए
खोजना चाहता हूँ चाँदी के शब्द
जिसमें जंग की गुँजायश बाकी न हो
शब्द जो केवल ताज़महल न हो
यथार्थ की उफनती नदी हो/
दर्द का महासागर हो जिसमें
मैं अपनी कविता को
बनाना चाहता हूँ शब्दों की रंगोली से
जिन रंगों की अपनी परिभाषा हो
शब्दों की रंगोली में शामिल हो/
मनुष्य के भीतर के तमाम रंग
और रंगों में छिपी हो मनुष्यता ।
डॉ. जय चन्द ‘उराड़ुवा’
दिनांक: 28-10-2018